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गुल हुई जाती है..

 

उस दिन शायद पहली बार किसी ने मेरे सामने आबिदा परवीन का नाम लिया था। 

नीतू अपने रंग में थी। हाथ हिला-हिलाकर कह रही थी, भाई, उनलोगों का तो लाइफस्टाइल ही अलग है। उनकी आधी बातें तो मेरे दिमाग के ऊपर से उड़ती रहती है। जब वो लोग बोलते हैं तो हम लोग सिर्फ सुनते हैं, क्या रिकी? उसने अपने भाई और मेरे दोस्त विकास की तरफ इशारे से पूछा। और उसके चेहरे पर हल्की सी मुस्कान दौड़ गई। 

मैंने हैरानी से पूछा, मतलब? आप कहना क्या चाहती हैं?

नीतू अपने एक जीजा और दीदी के बारे में बता रही थी। दीदी प्रियंका बुआ की लड़की थी। जीजा रमेश मेरठ के एक बड़े अखबार में काम करते थे। पत्रकारिता की तरफ मेरा हमेशा से रुझान था। उसकी बातें सुनने में मज़ा आने लगा। 

और क्या, नवंबर में भी दीदी जीजा दोनों बुआ के घर आए थे। हम लोग मिलने गए। लेकिन दो मिनट के अंदर दोनों पति-पत्नी की हवा-हवाई बातें शुरू हो गई। हमें ये अच्छा नहीं लगता है, हम ऐसे रहते है, ऐसा करते हैं। तुम्हारे जीजा तो बिलकुल अलग हैं, इनको तो सिर्फ खास-खास चीज़ें पसंद हैं। नीतू की बातों से साफ था इन लोगों के रहन-सहन में काफी फर्क था। हालांकि रमेश और उनकी पत्नी का बचपन भी बिहार के शहरों में बीता। लेकिन शादी के बाद काम और माहौल बदलने से कई बदलाव आ गए। दोनों के बखान में लगी नीतू एक के बाद एक कहानियां सुनाती जा रही थी।

तभी अचानक उसने एक सवाल दागा, अब बताइए ना, आपने कभी आबिदा परवीन का गाना सुना है?

एक पल के लिए मैं समझ नहीं सका। ऐसा लगा ठीक से सुना नहीं। दोबारा पूछा, किसका गाना?

अरे, आबिदा परवीन। कभी टीवी पर भी देखा होगा। सूफ़ी ग़ज़लें गाती हैं।

तब तक मैं नीतू की बात समझ चुका था। सामने आबिदा की तस्वीर उभर आई। उनके बारे में मैग्ज़ीन्स में थोड़ा बहुत पढ़ चुका था। हो सकता है कभी कोई ग़ज़ल सुनी भी हों। कुछ याद नहीं था। 

सोचते हुए मैं बोला, नहीं उनकी गज़लें तो नहीं सुनीं।

उन दोनों के सामने कभी भूल के भी ऐसा मत बोल दीजिएगा। और हम सभी एक साथ हंस पड़े। हां, और क्या! दीदी कहती है, हमलोग तो सड़क छाप गाने बिलकुल नहीं सुनते। तुम्हारे जीजू तो हमेशा आबिदा परवीन, तलत महमूद, और गुलाम अली ही सुनते रहते हैं। सच तो ये है अब मुझे भी यही सब अच्छा लगने लगा है।

ये वो वक्त था, जब मैंने अपने करियर के बारे में लगभग सोच लिया था। पत्रकारिता के रास्ते मंज़िल तक पहुंचना मुमकिन दिख रहा था। मेरठ वाले जीजाजी की कहानियां सुनकर लगा। मैं वक्त से काफी पीछे खड़ा हूं। मेरी पसंद तो बेहद फीकी और साधारण है।

जीजाजी का असर ऐसा हुआ कि घर से पटना लौटते ही सबसे पहले मैंने आबिदा परवीन की कुछ कैसेट्स खरीदी। उनकी रुहानी आवाज़ का मैं दीवाना होता चला गया। उर्दू  अल्फाज़ की वजह से कई ग़जलें पूरी तरह समझ में नहीं आती थीं। तब इंटरनेट की मदद लेने की मेरी समझ भी नहीं थी। मेरे कमरे में आबिदा जी की आवाज़ खूब गूंजा करती थी। वहां आने वाले दोस्तों पर भी धीरे-धीरे सूफी गज़लों का असर होने लगा।

उनका एक एल्बम है ‘फ़ैज़ बाई आबिदा’। इसमें पाकिस्तानी के मशहूर शायर स्वर्गीय फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की लिखी बेहतरीन गज़लों को उन्होंने आवाज़ दी है। बेहतरीन। सुनकर ऐसा लगता है, जैसे मन झूम रहा हो। उतरती-चढ़ती आवाज़ के साथ मैं ऐसे डूब जाता था कि आंसू बहने लगते थे। 

आज करीब दस सालों के बाद भी ये एल्बम मुझे सबसे ज्यादा पसंद है। पटना से दिल्ली आने के ठीक पहले मेरी एक दोस्त ने उसे मांग लिया। मन ना होने के बाद भी मैं मना नहीं कर सका। सोचा कोई नहीं, फिर खरीद लूंगा। हालांकि आज तक ऐसा मुमकिन नहीं हो पाया। अब इंटरनेट पास है। जब भी जी करता है आबिदा जी को खूब सुनता हूं। शब्दों के मतलब भी समझ में आते हैं। उस दमदार आवाज़ का असर आज भी कम नहीं हुआ। आपको भी सबसे मनपसंद एल्बम की कुछ ग़ज़लें सुनाता हूं। वैसे सभी लाजवाब हैं।

हां, दिल्ली आने के बाद मैं मेरठ वाले जीजाजी से भी मिलने गया। उनके बारे में आगे ज़रूर बताऊंगा।

 

पहली ग़ज़ल – गुल हुई जाती है

(सुनने के लिए लिए लिंक पर क्लिक करें)

गुल हुई जाती है अफ़सुर्दा सुलगती हुई शाम|
धुल के निकलेगी अभी, चश्म-ए-महताब से रात||

गुल हुई जाती है अफ़सुर्दा सुलगती हुई शाम|
और मुश्ताक निगाहों की सुनी जायेगी,
और उन हाथों से मस्स होंगे ये तरसे हुए हाथ||

उनका आँचल है कि रुख़सार के पैराहन हैं,
कुछ तो है जिससे हुई जाती है चिलमन रंगीं,
जाने उस ज़ुल्फ़ की मौहूम घनी छांवों में,
टिमटिमाता है वो आवेज़ा अभी तक कि नहीं||

गुल हुई जाती है अफ़सुर्दा सुलगती हुई शाम|
आज फिर हुस्न-ए-दिलारा की वही धज होगी,
वो ही ख्वाबीदा सी आँखें, वो ही काजल की लकीर,
रंग-ए-रुख्सार पे हल्का-सा वो गाज़े का गुबार,
संदली हाथ पे धुंधली-सी हिना की तहरीर।

अपने अफ़कार की अशार की दुनिया है यही,
जाने मज़मूं है यही, शाहिदे-ए-माना है यही,
अपना मौज़ू-ए-सुखन इन के सिवा और नही,
तबे शायर का वतन इनके सिवा और नहीं।

ये खूं की महक है कि लब-ए-यार की खुशबू,
किस राह की जानिब से सबा आती है देखो,
गुलशन में बहार आई कि ज़िंदा हुआ आबाद,
किस सिंध से नग्मों की सदा आती है देखो||

गुल हुई जाती है अफ़सुर्दा सुलगती हुई शाम|

 

एक और ग़ज़ल- शाम-ए-फिराक़

शाम ए फिराक अब ना पूछ,  आई और आ के टल गई।
दिल था कि फिर बहल गया, जां थी कि फिर संभल गई।।
जब तुझे याद कर लिया, सुबह महक महक उठी।
जब तेरा गम जगा लिया, रात मचल मचल गई।।

दिल से तो हर मुआमलात करके चले थे साफ हम
कहने में उनके सामने बात बदल बदल गई।।

फ़िराक़ गोरखपुरी 

 फ़िराक़ गोरखपुरी

 (रघुपति सहाय) (1896-1982)

एक ऐसे उर्दू शायर जो किसी परिचय के मोहताज़ नहीं। उस ज़माने में पीसीएस की नौकरी ठुकरा कर इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेज़ी पढ़ाना मुनासिब जाना। हिन्दी, संस्कृत, उर्दू, फारसी और अंग्रेज़ी हर ज़बान की उतनी ही समझ। लेकिन दिल उर्दू से लग गया। लिखते रहे और गहराई से लिखा। ज़िन्दगी के मोर्चे पर बड़े-बड़े तूफ़ान आते रहे लेकिन शायरी से मुहब्बत जारी रही। इस मुहब्बत ने ज़िंदा रखा और शोहरत की बुलंदियां भी दीं। और गुल-ए-नग़मा जैसी रचना के लिए ज्ञानपीठ सम्मान से नवाज़े गए।

अपनी पसंद की कुछ नज़्में आपके सामने रख रहा हूं।

 

“आज कुछ आहट सी दिलों को मिली

मुद्दतों वीरान थीं ये बस्तियां।

जब निगहे-नाज़ की याद आ गयी

तैर गयीं सीने में कुछ बिजलियां।

राह में है उस की जवानी अभी

अब वो ज़मीं और न वो आस्मां।

 दे ही गया एक पयामे-सुकूं

देर से छाया हुआ ग़म का समां।”

 

 “जो भूल कर भी इधर से कभी गुज़रता है

मैं सोचता हूं कि वो कल को आज करता है।

समाई है तेरे सर में हवा-ए-हूरो-परी

हमारा दिल तो दम इक आदमी का भरता है।

उदास होती चली है फ़ज़ा ज़माने की

कि ग़म से हुस्न भी अब इत्तिफ़ाक़ करता है।

वफ़ा तो सुनते हैं दुनिया से मिट गयी लेकिन

दिलों में आज तक इक नक़्श सा उभरता है।”

 

 “अपने ग़म का मुझे कहां ग़म है

ऐ कि तेरी ख़ुशी मुक़द्दम है।

इस में ठहराओ या सुकून कहां

ज़िन्दगी इन्क़िलाबे पैहम है।

उठने वाली है बज़्म, माज़ी की

रोशनी कम है, ज़िन्दगी कम है।

मेरे सीने से लग के सो जाओ

पलकें भारी हैं रात भी कम है।”

 

मेरी पसंद के नज़्म अभी और भी हैं। आपको पसंद आईं तो अगली क़िश्त में ढ़ेर सारे और नज़्मों के साथ लौटूंगा।

मीना जी

न हाथ थाम सके, न पकड़ सके दामन

बड़े क़रीब से उठकर चला गया कोई।

फ़िल्मों की समझ मुकम्मल होने से काफ़ी पहले ही मीना कुमारी जी मुझ पर अलग छाप छोड़ चुकी थी। पिताजी फ़िल्मों के शौकीन थे। दूरदर्शन के ज़माने में जब उनकी पसंद की फ़िल्में दिखाई जाती तो खुलकर उसके बारे में बताया करते थे। और फ़िल्मों को समझने की बुनियाद ऐसे ही पड़ी। फिर वक़्त के साथ इसमें नई कड़ियां जुड़ती गईं, कई बातें मिटती गईं। लेकिन मीना जी की अदाकारी मेरी उम्र के साथ और संजीदा होती चली गई। उम्र और एहसास दोनों जो गहरे होते जा रहे थे।   लेकिन इस दौरान भी मुझे इल्म न था कि मीना जी एक बेहतरीन शायर भी थीं। और उनकी शायरी में भी वही दर्द था जो इस अदाकारा के किरदार में था। कहती रहीं:

 

टुकड़े-टुकड़े दिन बीता,

धज्जी-धज्जी रात मिली।

जिसका जितना आंचल था,

उतनी ही सौग़ात मिली।।

 

मीना जी के नज़्म

जब चाहा दिल को समझें,

हंसने की आवाज़ सुनी।

जैसे कोई कहता है, लो

फिर तुमको अब मात मिली।।

 

बातें कैसी? घातें क्या?

चलते रहना आठ पहर।

दिल-सा साथी जब पाया, 

बेचैनी भी साथ मिली।।

 

मीना जी के लिए हर लम्हा आग़ाज़ था। उन्हीं के शब्दों में :

मीना जी की गजलें 

 

 

 

 

 

आग़ाज़ तो होता है, अंजाम नहीं होता,

 जब मेरी कहानी में वह नाम नहीं होता।

 जब ज़ुल्फ़ की कालिख में गुम हो जाएगा राही,

बदनाम सही, लेकिन, गुमनाम नहीं होता!

हंस-हंस के जवां दिल के हम क्यों ने चुनें टुकड़े?

हर शख़्स की क़िस्मत में ईनाम नहीं होता।

कई और नज़्म और ग़ज़लें हैं जो आगे भी मैं आपके सामने पेश करता रहूंगा।

शिल्पा को रिचर्ड का तोहफ़ा

ये सिलेब्रिटी भी अजीब चीज़ होता है। उसकी ज़िंदगी, उसकी हरकतों को अगर समझने की कोशिश करें तो ये बेहद बेईमान और झूठे क़िस्म की जमात दिख पड़ता है। ये कोई मेरा पूर्वाग्रह नहीं है। और ना ही मुझे इन सिलेब्रिटीज़ की ज़िंदगी में कोई दिलचस्पी है। लेकिन ये लोग गाहे-बगाहे धमाका ही कुछ ऐसा कर जाते हैं कि जब तक आप संभले आपके दिमाग़ में कई जानकारियां छोड़ जाते हैं।

 मैंने तो सोचा था कि बिग ब्रदर से शिल्पा शेट्टी ने इतनी शोहरत बटोर ली है कि अब उन्हें किसी ऐसे शो की ज़रूरत ही ना पड़े। लेकिन वो फिर सुर्ख़ियों में हैं। वजह भी निकल आया।

 एक बार फिर कुछ ऐसा हो गया कि जिसने देखा मुंह ताकता रह गया। और जो हुआ उस पर बिग ब्रदर शो की तरह ही शिल्पा ने तुरंत प्रतिक्रिया भी दे दी। कहा, ये कुछ ज्यादा ही हो गया। हालांकि शिल्पा के चेहरे पर मुस्कान बनाए रखने की जद्दोजहद और असमंजस की लकीरों से भी ये ज़ाहिर था। लोगों ने सोचा शाम तक रिचर्ड गेयर मीडिया से रूबरु होकर अपनी ग़लती मान लेंगे। कह देंगे कि अति उत्साह में मैं बहक गया। और शिल्पा भी इसे ऐसा ही मान लेंगी। शिल्पा रिचर्डलेकिन हुआ फिर वही जो ब्रिटेन के उस शो में हुआ था। (जैसे पूरी दुनिया के सामने जेड गुडी के बयान को नस्लीय बता कर अगले ही दिन शिल्पा का हृदय परिवर्तन हो गया, ठीक वैसे ही) शिल्पा फिर दूसरे करवट बैठ गईं। उनका कायाकल्प रिचर्ड की बेहूदा हरकत की तरह ही चौंकाने वाला था। पूरी दुनिया के सामने पेश आए एक आपत्तिजनक वाकये को शिल्पा ने निजी मामला बताकर रफ़ा-दफ़ा कर दिया। अब लोगों की नाराज़गी को वो तांकझांक जैसा बता रहीं थी। कहा, जब मुझे किसी बात पर आपत्ति नहीं तो आपको क्यों, रिचर्ड ने कौन सी बड़ी ग़लती कर दी? तो, क्या दो लोगों की रज़ामंदी होने से उन्हें आपस में कहीं कुछ भी करने की आज़ादी हासिल हो जाती है? कहती हैं होठों पर तो नहीं चूमा रिचर्ड ने? मतलब होठों पर चूमते तो लोगों का ऐतराज़ वाजिब हो जाता। सवाल करती हैं अच्छा खासा कार्यक्रम था, कार्यक्रम का एक सामाजिक सरोकार था लेकिन मीडिया को सिर्फ चुंबन ही दिखा? अरे भई, किसने छुपाया कि आप, सन्नी देओल और रिचर्ड गेयर एड्स के बारे में ट्रक ड्राइवरों को जागरूक करने गईं थी।

 शिल्पा की नाराज़गी अभी ख़त्म नहीं हुई थी। लगे हाथों खुलासा कर दिया कि रिचर्ड गेयर ने उस घटना के बाद उनसे माफ़ी भी मांगी और इससे वो काफ़ी शर्मिंदा हुईं। वाह। और हों भी क्यों ना, रिचर्ड की शैल वी डांस के पोज़ को वो थोड़ी देर के लिए ग़लत जो समझ बैठी थीं। माफ़ी की क्या ज़रूरत थी, रिचर्ड?

शिल्पा प्रवचन यहीं नहीं रुका। शिल्पा ने इसी बहाने हमारे लिए भारतीय संस्कृति की व्याख्या भी की। हमारी आंखें खोल दी। कहतीशिल्पा हैं रिचर्ड ने एड्स के लिए कार्यक्रम को स्पॉन्सर किया था, उसकी नीयत नहीं दिखी आपको? ये लो, तो हमने कब रिचर्ड गेयर के भारत के घुसते ही वापस जाओ का नारा बुलंद कर दिया था। वो ना जाने कितनी बार आए और गए। उनके विचार और सहायता कार्यों को अब तक सराहना ही मिली। लेकिन शिल्पा का मतलब है कि हम एहसान-फरामोश निकले। हमारे फायदे के लिए डॉलर ख़र्च करके रिचर्ड गेयर कुछ भी उलूल-जुलूल करने के हक़दार जो बन गए। शिल्पा हमें ज्ञानबोध करा रही हैं। रिचर्ड, हमसे गलती हो गई। अब आप हम पर डॉलर ख़र्च करो और हम आपके नंगापन पर ताली बजा कर आपका कर्ज़ उतारेंगे।

शिल्पा जी, रिचर्ड ने आपसे माफ़ी मांगी या नहीं कोई नहीं जानता। शरीफ़ तो उन्हें हम तब मानते जब वो खुल कर लोगों से इस पर सफ़ाई देते। लेकिन जब मन में चोर बैठा हो तो वो सामने कैसे आएं। आपसे माफ़ी की बात सच मान भी लें तो आपको भले ही इस पर शर्मिंदगी महसूस हुई हो। लेकिन हमें तो शर्म आती है उस पर जो हमने देखा। आपने इसे अपना निजी मामला समझ कर भले ही निपटा दिया। कह दिया कि रिचर्ड को हिन्दी नहीं आती इसलिए बदहवासी में चूमने की भाषा में हमारा मनोरंजन कर रहे थे। लेकिन आपका ये मनगढंत तर्क किसी के गले नहीं उतरा। आपको भले लगता हो कि आपके होठों को न चूमकर रिचर्ड हमारी संस्कृति का मान रख गए। लेकिन संस्कृति तो दूर की बात है रुपहले पर्दे पर सीन देते देते आप तो ये भी भूल गई कि हमारे देश में आज भी इस तरह की ओछी हरकतों की निंदा ही होती है। और अनर्गल तर्कों से इसे जायज़ नहीं ठहराया जा सकता। आप जिस तरह से अपने राग बदलती हैं उसे देखकर आप भी उतनी ही बड़ी कसूरवार लगती हैं जितना कि रिचर्ड गेयर।

अगड़ों अभी भुगतो!

मुसलमान और पिछड़ी जाति के मसले पर हमारे देश में हर बात का बखेड़ा बन जाता है। बुद्धिजीवियों के बीच तर्क-वितर्क के तीर चलने लगते हैं। सियासत ज़ोर पकड़ लेती है। सबको अपनी रोज़ी रोटी याद आ जाती है। मैं ये नहीं कहता कि बाक़ी मसलों पर बुद्धिजीवी या सियासतदान हाथ पर हाथ धरे बैठे रहते हैं। लेकिन इन मसलों की तो बात ही कुछ और है।

 ताज़ा मामला इलाहाबाद कोर्ट के फ़ैसले से जुड़ा है। जैसे लगा पूरे देश में भूचाल आ गया। हर तरह के बयान आने आरक्षणलगे। फ़ैसले के सही ग़लत होने की गुंजाइश अभी बची थी। लेकिन आनन-फानन में लोगों ने जज को किसी पार्टी का एजेंट करार दिया। ज़ाहिर तौर कोई सियासी फ़ैसला नहीं था तो किसी सियासी बयानबाज़ी की भी दरकार भी नहीं थी। लेकिन बीजेपी ने मौक़ापरस्ती दिखा दी। झटपट बयान जारी कर दिया कि फ़ैसले से प्रदेश में मुसलमानों की हक़ीक़त सामने आई है। और अगले ही दिन फ़ैसला बदल दिये जाने पर चुप्पी साध ली गई।

हमारे देश में मसलों के उलझते चले जाने की और कोई वजह नहीं है। सब अपनी रोटी सेंकने में लगे हैं। क्या हो गया? अगर कोर्ट ने कोई फ़ैसला सुना दिया तो उसकी समीक्षा भी होती है। और भी रास्ते हैं। आख़िरकार जो सच होगा वही सामने आएगा। सच को सामने लाने के साधन जुटाए जाने चाहिए। उल्टा यहां अपनी राय मनवाने की ज़िद में सुबूत पेश किये जाते हैं। मैं ये कहता हूं और जो कहता हूं वो ऐसे साबित होती है, लो।

चाहे वो इलाहाबाद कोर्ट का फ़ैसला हो या फिर पिछड़ी जाति को आरक्षण के मसले पर सुप्रीम कोर्ट की अंतरिम रोक हो। हम इस तरह के फ़ैसले की वजह पर सोचने की ज़रूरत ही नहीं समझते। अगर सुप्रीम कोर्ट कहता है कि आंकड़े पेश करो तो इसमें क्या ग़लत है? आख़िर आपने जिन बातों को आधार बनाया है उसकी साफ़ तस्वीर तो सामने रखें। लेकिन नहीं, पिछड़े तबके से आने वाला हर व्यक्ति इसका जैसे भी हो विरोध करेगा और अगड़े कहे जाने वाले समर्थन में मिठाइयां बांटेंगे। जबकि फ़ैसला अभी आख़िरी नहीं है।

बात ये भी समझ में नहीं आती कि सरकार लोगों को अंधेरे में रख कर फ़ैसले क्यों लेती है? मुझे भी ये जानने का पूरा हक़ है किअर्जुन सिंह आख़िर क्या वजह है कि किसी ख़ास जाति या समुदाय को कोई तवज्जोह मिले। ज़ाहिर है वजह वाजिब होगी तो लोग इस तरह आधे-आधे नहीं बंटेंगे। वरना मेरी समझ में तो पहली नज़र में ये नहीं आता कि किसी को अल्पसंख्यक होना का फ़ायदा दिया जा रहा है तो किसी को बहुसंख्यक होने का। अल्पसंख्यक को सुविधाएं देने की जो वजह बताईं जाती हैं और बहुसंख्यक में फिट नहीं बैठती। अगर मामला आर्थिक स्तर का है तो उसे ही आधार बना दो। लेकिन सरकार को उसमें भी घालमेल हो जाने का डर है। ऐसी व्यवस्था तैयार नहीं है जो ठीक-ठीक ये तय करे कि किसकी हैसियत कितनी है? अगर फ़ैसला न्यायपूर्ण है तो व्यवस्था बनाई जाए। लेकिन नहीं, फिर गैर-वाजिब लोगों की सुविधाएं छिन जाएंगी। पहले तो नेता लोग ही लिस्ट से बाहर हो जाएंगे क्योंकि उनकी माली हालत तो नेता बनते ही दुरुस्त हो चुकी है। और जब अपना ही फ़ायदा न हो तो दूसरों के लिए झंडा क्यों उठाएं? ऊपर से बाक़ी मालदार सुविधापरस्तों की तादाद भी कोई कम तो है नहीं। मतलब रहने दो जैसा चल रहा है। लोग असंतुष्ट दिख रहे हैं और ज्यादा हक़ की बात करते हैं तो इसी में कुछ और हिस्सा मार लो। हिसाब भी ठीक है। जब अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक दोनों खुश हैं तो बीच वाले तो ऐसे भी कई दूसरे मसलों पर बंटे हुए हैं। अपने नेता भाइयों की जमात में कुछ इधर जाएंगे तो कुछ उधर। मामला बराबर।

क़ानून बनने के इतने सालों में इन सुविधाएं के बावजूद तरक्की कितनी हुई है? लेखाजोखा धुंधला है। कुछ कह नहीं सकते। अभी और समय लगेगा। अल्पसंख्यकों और पिछड़ी जातियों में अभी ग़रीबी मिटी नहीं है। जैसे अगड़ी जाति में कोई ग़रीब नहीं होता। उसकी शिक्षा ज़रूरी नहीं है। उसे नौकरी की क्या ज़रूरत है? अभी वो और भुगते। बाप दादों ने बड़े ज़ुल्म किये हैं पिछड़ी जातियों पर। इसलिए अब कई पुश्तों तक वो भी भुगते। प्रजातंत्र है तो क्या? कुछ तो समझौता करना ही पड़ेगा, भई। इतना तो इन्हें ख़ुद ही समझ लेना चाहिए।