फ़िराक़ गोरखपुरी
(रघुपति सहाय) (1896-1982)
एक ऐसे उर्दू शायर जो किसी परिचय के मोहताज़ नहीं। उस ज़माने में पीसीएस की नौकरी ठुकरा कर इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेज़ी पढ़ाना मुनासिब जाना। हिन्दी, संस्कृत, उर्दू, फारसी और अंग्रेज़ी हर ज़बान की उतनी ही समझ। लेकिन दिल उर्दू से लग गया। लिखते रहे और गहराई से लिखा। ज़िन्दगी के मोर्चे पर बड़े-बड़े तूफ़ान आते रहे लेकिन शायरी से मुहब्बत जारी रही। इस मुहब्बत ने ज़िंदा रखा और शोहरत की बुलंदियां भी दीं। और गुल-ए-नग़मा जैसी रचना के लिए ज्ञानपीठ सम्मान से नवाज़े गए।
अपनी पसंद की कुछ नज़्में आपके सामने रख रहा हूं।
“आज कुछ आहट सी दिलों को मिली
मुद्दतों वीरान थीं ये बस्तियां।
जब निगहे-नाज़ की याद आ गयी
तैर गयीं सीने में कुछ बिजलियां।
राह में है उस की जवानी अभी
अब वो ज़मीं और न वो आस्मां।
दे ही गया एक पयामे-सुकूं
देर से छाया हुआ ग़म का समां।”
“जो भूल कर भी इधर से कभी गुज़रता है
मैं सोचता हूं कि वो कल को आज करता है।
समाई है तेरे सर में हवा-ए-हूरो-परी
हमारा दिल तो दम इक आदमी का भरता है।
उदास होती चली है फ़ज़ा ज़माने की
कि ग़म से हुस्न भी अब इत्तिफ़ाक़ करता है।
वफ़ा तो सुनते हैं दुनिया से मिट गयी लेकिन
दिलों में आज तक इक नक़्श सा उभरता है।”
“अपने ग़म का मुझे कहां ग़म है
ऐ कि तेरी ख़ुशी मुक़द्दम है।
इस में ठहराओ या सुकून कहां
ज़िन्दगी इन्क़िलाबे पैहम है।
उठने वाली है बज़्म, माज़ी की
रोशनी कम है, ज़िन्दगी कम है।
मेरे सीने से लग के सो जाओ
पलकें भारी हैं रात भी कम है।”
मेरी पसंद के नज़्म अभी और भी हैं। आपको पसंद आईं तो अगली क़िश्त में ढ़ेर सारे और नज़्मों के साथ लौटूंगा।





wah bhai padh kar maza aa gaya
aapki kishton ka hame intezar hai
वाह, फिराक पर हम भी फिदा रहे हैं।
अब अक्सर चुप चुप से रहे हैं यूं ही कभू लब खोले हैं
पहले फिराक को देखा होता अब तो बहुत कम बोले हैं
अच्छा है ओम, अच्छे शेर हमारी ज़िन्दगी बढ़ाते हैं।
[...] इतिहास/पुराने पन्नेअपने ग़म का मुझे कहां ग़म है [...]
BHAI OM KYA BAAT HAI ACHI RESEARCH KI HAI TUMNE YAAR AISE HI LIKHTE RAHO AAJKAL ITNA TIME TO HAI NAI KI MARKET SE BUKS KHARID K LAAYEN TUM AISE HI LIKHO MAIN YAHIN READ KARK TUMHEIN THNX KAHUNGA WELDON GUD JOB N THNX KIP IT UP YAAR K BYE
वाह भई बहुत अच्छे से आपने नज़्में उकेरा है…..
aapki lekhan shailee ka jawab nahi,itne saral shabdon me sab kuch kah jate hain.aap jaise logon ki hi wajah se sahitya ke ye anmol moti pathakon ko padhne ko mil rahe hain nahin to ye sirf kitabon tak hi simit rah jate. urdu ke kathin shabdon ke arth agar likhen to hamare jaise pathakon ke liye kafi sahuliyat hogi aur tab bahut mumkin hai ki zyada se zyada pathak in nazmon ko padh sakenge.
aage bhi isi tarah likhte rahiye .
बढिया है भाई आगे इंतजार रहेगा
वाह! फ़िराक़ गोरखपुरी की बढ़िया नज़्म आपके मार्फ़त पढ़ने को मिली, शुक्रिया। अगली क़िश्त का इंतेज़ार है।
दिल की कलम से
नाम आसमान पर लिख देंगे कसम से
गिराएंगे मिलकर बिजलियाँ
लिख लेख कविता कहानियाँ
हिन्दी छा जाए ऐसे
दुनियावाले दबालें दाँतो तले उगलियाँ ।
NishikantWorld