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Archive for May, 2007

 
 फ़िराक़ गोरखपुरी
 (रघुपति सहाय) (1896-1982)

एक ऐसे उर्दू शायर जो किसी परिचय के मोहताज़ नहीं। उस ज़माने में पीसीएस की नौकरी ठुकरा कर इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेज़ी पढ़ाना मुनासिब जाना। हिन्दी, संस्कृत, उर्दू, फारसी और अंग्रेज़ी हर ज़बान की उतनी ही समझ। लेकिन दिल उर्दू से लग गया। लिखते रहे और गहराई से लिखा। ज़िन्दगी के [...]

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“न हाथ थाम सके, न पकड़ सके दामन
बड़े क़रीब से उठकर चला गया कोई।”
फ़िल्मों की समझ मुकम्मल होने से काफ़ी पहले ही मीना कुमारी जी मुझ पर अलग छाप छोड़ चुकी थी। पिताजी फ़िल्मों के शौकीन थे। दूरदर्शन के ज़माने में जब उनकी पसंद की फ़िल्में दिखाई जाती तो खुलकर उसके बारे में [...]

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