मुसलमान और पिछड़ी जाति के मसले पर हमारे देश में हर बात का बखेड़ा बन जाता है। बुद्धिजीवियों के बीच तर्क-वितर्क के तीर चलने लगते हैं। सियासत ज़ोर पकड़ लेती है। सबको अपनी रोज़ी रोटी याद आ जाती है। मैं ये नहीं कहता कि बाक़ी मसलों पर बुद्धिजीवी या सियासतदान हाथ पर हाथ धरे बैठे रहते हैं। लेकिन इन मसलों की तो बात ही कुछ और है।
ताज़ा मामला इलाहाबाद कोर्ट के फ़ैसले से जुड़ा है। जैसे लगा पूरे देश में भूचाल आ गया। हर तरह के बयान आने
लगे। फ़ैसले के सही ग़लत होने की गुंजाइश अभी बची थी। लेकिन आनन-फानन में लोगों ने जज को किसी पार्टी का एजेंट करार दिया। ज़ाहिर तौर कोई सियासी फ़ैसला नहीं था तो किसी सियासी बयानबाज़ी की भी दरकार भी नहीं थी। लेकिन बीजेपी ने मौक़ापरस्ती दिखा दी। झटपट बयान जारी कर दिया कि फ़ैसले से प्रदेश में मुसलमानों की हक़ीक़त सामने आई है। और अगले ही दिन फ़ैसला बदल दिये जाने पर चुप्पी साध ली गई।
हमारे देश में मसलों के उलझते चले जाने की और कोई वजह नहीं है। सब अपनी रोटी सेंकने में लगे हैं। क्या हो गया? अगर कोर्ट ने कोई फ़ैसला सुना दिया तो उसकी समीक्षा भी होती है। और भी रास्ते हैं। आख़िरकार जो सच होगा वही सामने आएगा। सच को सामने लाने के साधन जुटाए जाने चाहिए। उल्टा यहां अपनी राय मनवाने की ज़िद में सुबूत पेश किये जाते हैं। मैं ये कहता हूं और जो कहता हूं वो ऐसे साबित होती है, लो।
चाहे वो इलाहाबाद कोर्ट का फ़ैसला हो या फिर पिछड़ी जाति को आरक्षण के मसले पर सुप्रीम कोर्ट की अंतरिम रोक हो। हम इस तरह के फ़ैसले की वजह पर सोचने की ज़रूरत ही नहीं समझते। अगर सुप्रीम कोर्ट कहता है कि आंकड़े पेश करो तो इसमें क्या ग़लत है? आख़िर आपने जिन बातों को आधार बनाया है उसकी साफ़ तस्वीर तो सामने रखें। लेकिन नहीं, पिछड़े तबके से आने वाला हर व्यक्ति इसका जैसे भी हो विरोध करेगा और अगड़े कहे जाने वाले समर्थन में मिठाइयां बांटेंगे। जबकि फ़ैसला अभी आख़िरी नहीं है।
बात ये भी समझ में नहीं आती कि सरकार लोगों को अंधेरे में रख कर फ़ैसले क्यों लेती है? मुझे भी ये जानने का पूरा हक़ है कि
आख़िर क्या वजह है कि किसी ख़ास जाति या समुदाय को कोई तवज्जोह मिले। ज़ाहिर है वजह वाजिब होगी तो लोग इस तरह आधे-आधे नहीं बंटेंगे। वरना मेरी समझ में तो पहली नज़र में ये नहीं आता कि किसी को अल्पसंख्यक होना का फ़ायदा दिया जा रहा है तो किसी को बहुसंख्यक होने का। अल्पसंख्यक को सुविधाएं देने की जो वजह बताईं जाती हैं और बहुसंख्यक में फिट नहीं बैठती। अगर मामला आर्थिक स्तर का है तो उसे ही आधार बना दो। लेकिन सरकार को उसमें भी घालमेल हो जाने का डर है। ऐसी व्यवस्था तैयार नहीं है जो ठीक-ठीक ये तय करे कि किसकी हैसियत कितनी है? अगर फ़ैसला न्यायपूर्ण है तो व्यवस्था बनाई जाए। लेकिन नहीं, फिर गैर-वाजिब लोगों की सुविधाएं छिन जाएंगी। पहले तो नेता लोग ही लिस्ट से बाहर हो जाएंगे क्योंकि उनकी माली हालत तो नेता बनते ही दुरुस्त हो चुकी है। और जब अपना ही फ़ायदा न हो तो दूसरों के लिए झंडा क्यों उठाएं? ऊपर से बाक़ी मालदार सुविधापरस्तों की तादाद भी कोई कम तो है नहीं। मतलब रहने दो जैसा चल रहा है। लोग असंतुष्ट दिख रहे हैं और ज्यादा हक़ की बात करते हैं तो इसी में कुछ और हिस्सा मार लो। हिसाब भी ठीक है। जब अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक दोनों खुश हैं तो बीच वाले तो ऐसे भी कई दूसरे मसलों पर बंटे हुए हैं। अपने नेता भाइयों की जमात में कुछ इधर जाएंगे तो कुछ उधर। मामला बराबर।
क़ानून बनने के इतने सालों में इन सुविधाएं के बावजूद तरक्की कितनी हुई है? लेखाजोखा धुंधला है। कुछ कह नहीं सकते। अभी और समय लगेगा। अल्पसंख्यकों और पिछड़ी जातियों में अभी ग़रीबी मिटी नहीं है। जैसे अगड़ी जाति में कोई ग़रीब नहीं होता। उसकी शिक्षा ज़रूरी नहीं है। उसे नौकरी की क्या ज़रूरत है? अभी वो और भुगते। बाप दादों ने बड़े ज़ुल्म किये हैं पिछड़ी जातियों पर। इसलिए अब कई पुश्तों तक वो भी भुगते। प्रजातंत्र है तो क्या? कुछ तो समझौता करना ही पड़ेगा, भई। इतना तो इन्हें ख़ुद ही समझ लेना चाहिए।




